Sunday, January 29, 2023
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भय, अहंकार और त्रिभुज

मनुष्य अपने को दोषी कैसे समझे? उसकी बुद्धि का तो समाज, धर्म व राजनीति के त्रिभुज से हरण है। हर मनुष्य त्रिभुज की ओपन जेल का बेसुध प्राणी है। हर बुराई याकि ईविल उसे इसलिए खटकती नहीं है क्योंकि उनका इतिहास व वंशानुगत अनुभवों से साधारणीकरण हुआ पड़ा है। कभी तलवार थी तो अब मिसाइल, बुलडोजर व लाठी है। इसलिए वह जायज है और उपयोगी है। पशुता, ईविल और औजार स्थायी है। पर हां, रूप बदलते हैं। कोई बुराई समाज का सहारा है तो किसी से धर्म को बल है और किसी से राजनीति का जलवा बनता है।

प्रलय का मुहाना-27: यदि खुली जेल और पालतू जीवन मनुष्य सच्चाई है तो सवाल है भला फिर मनुष्य के सभ्य बनने, सभ्यता बनाने की बातों का क्या अर्थ? इससे भी अधिक गहरा सवाल है कि मनुष्य घूम फिर कर पशुगत नियति में फंसा क्यों मिलता है? वजह मनुष्य खुद। जो हुआ है और जो है वह मनुष्य के अपने विचारों से है। मतलब पहली बात जैसी मनुष्य प्रकृति वैसे आइडिया! दूसरा बिंदु जैविक शरीर (डीएनए) की खोपड़ी से बना तयशुदा व्यवहार है। तीसरा बिंदु बुद्धि, स्वतंत्रता (कर्म) और ‘मैं’ के ‘मालिकना’ की उड़ती तीन वृत्तियां हैं। चौथा बिंदु मानव के तीन आविष्कार-औजार (पत्थर, अग्नि और भाषा) है। पांचवां बिंदु उसकी तीन प्राप्तियां (शिकार, पशुपालन और प्लांटपालन कृषि) है। छठा, आखिरी बिंदु मन के भय में होमो सेपियन द्वारा समाज, धर्म और राजनीति को बनाना है। और फिर इन तीनों के त्रिभुज में वैयक्तिकता का जकडऩा है।

विज्ञान, मनोविज्ञान, दर्शन, धर्म की किसी भी भाषा और समझ में विचार करें तो यह सत्य समझ आएगा कि इंसान ने ब्रह्मा की बुद्धि, विष्णु के चित्त-कर्म, शिव के अहंकार, चंद्रमा के चंचल मन, इंद्रियों की सूक्ष्म पञ्चतन्मात्राओं (स्पर्श, रस, गंध, रूप और शब्द) सभी को उनकी पूर्णता में समाज, धर्म और राजनीति के त्रिभुज का बंधक बनाया है, जिससे मानव जिंदगी नियतिगत ढर्रे की मारी है।

यहीं मनुष्य की कुल उपलब्धि है! इसी में क्रमिक विकास है। कहानियां हैं। इतिहास है। सभ्यताओं के बाड़े हैं। देशों की चारदिवारियां हैं। विकास और विनाश दोनों का वह सिलसिला है, जिसका अंत अब पर्यावरण और पृथ्वी के प्रलय की टाइमलाइन की करीबी से आता हुआ होना है।
यक्ष प्रश्न है क्यों होमो सेपियन ने पहले तो समाज, धर्म, राजनीति के आइडिया खोजे और क्यों  वह तीन भुजाओं की त्रिपुटी में जिंदगी को बांध बैठा?

समाज, धर्म, राजनीति
जवाब में पहला मूल कारण भय है। भय ही वह कारण है, जिससे पहले व्यक्ति कबीले का हिस्सा हुआ।  दूसरे, जिसके कारण जादू-टोना, कबिलाई ओझा याकि पुरोहित और अंधविश्वास बने। तीसरे, चिम्पांजियों की तरह मनुष्यों के टोले मुखियाओं से संचालित होने लगे। इन तीनों का रूपांतरण फिर खेती और बसावट के साथ समाज, धर्म और राजनीति में हुआ।

दूसरा कारण मनुष्य स्वभाव की भिन्नताओं का है। मतलब पशुओं की तरह मनुष्य दिमाग क्योंकि एक जैसी बुद्धि लिए हुए नहीं है तो हर व्यक्ति दिल-दिमाग में अलग-अलग खुराफातों, आइडिया, व्यवहार लिए होता है। हर दिमाग अपने अस्तित्व का बोध बनाए होता है। उसी के अहम में फिर वह ‘मैं’ के आत्मकेंद्रित, वैयक्तिक स्वभाव में ढला होता है।
इसलिए मानव बुद्धि और स्वभाव की भिन्नताओं ने होमो सेपियन की खोपड़ी में आइडिया पैदा किया कि मनुष्यों का एक साथ व बंधा रहना जरूरी है। उनका एक सा व्यवहार बनाना जरूरी है। अन्यथा अलग-अलग वैयक्तिक खोपडिय़ों के मनुष्यों का न तो एक साथ रहना संभव है और न भूख, भय, शिकारी की वृत्तियों के झगड़े खत्म होंगे। सुरक्षा के खातिर भी सामूहिक जीवन मनुष्य अस्तित्व के लिए जरूरी है। तभी परिवार, कबीले, कुनबे, जात आदि के टैग में समाज का क्रमिक निर्माण हुआ।

सो, समाज निर्माण त्रिभुज की पहली भुजा, पहला कोण, पहला शीर्ष था और है। फिर जब घुमंतू मनुष्य खेती के लिए एक जगह साथ रहने लगे, बस्ती-कस्बों की बसावट हुई तो जांगल-कबीलाई जीवन के वक्त बनी अंधविश्वासी परपंराओं, जादू-टोनों की निरंतरता में धर्म ने व्यवस्थागत रूप पाया। अंधविश्वासों की नए सिरे से उपयोगिता बनी। नए आइडिया बने। मनुष्यों के अलग-अलग स्वभाव, ताकत, व्यवहार की हकीकत में सोचा गया कि ऐसा होना किसी अलौकिक शक्ति का परिणाम है। कोई ईश्वर है जो व्यक्ति में अलग स्वभाव और व्यवहार बनाता है। उससे पहले नर-नारी, दुर्बल-शक्तिमान, संतानहीन-संतानमय, दुखी-सुखी, आपदा-विपदा याकि जिंदगी के अनुभवों की भिन्नताओं में मनुष्य खोपड़ी में विचार हुआ कि भला यह सब कैसे? इसी के जवाब में अलौकिक शक्ति, ईश्वरीय लीला की कल्पना बनी। आगे फिर वैयक्तिक विशेषताओं को अलौकिक शक्ति की कल्पनाओं में सोचा गया। पुरोहित ताकतवर हुआ। रिचुअल-अनुष्ठान जीवन की अनिवार्यता हो गए। सामूहिक जीवन में रहने के कायदे-पद्धति में सदाचार-कदाचार-नैतिक मूल्य, संस्कारों,पाप-पुण्य के धर्म आइडिया बने।

और धर्म त्रिभुज की दूसरी भुजा, दूसरा कोण, दूसरे शीर्ष का निर्माण था और है। इसमें कबीले के ओझा की महत्ता, ऊंच-नीच, शक्तिमान-कमजोर व्यक्ति के अनुभव में भेदभाव घुमंतू जीवन से ही बने हुए थे। पुरोहित और कबीलों के वंशानुगत सरदार की संरचना अपने आप घुमंतुओं की स्थायी बसावट का आधार हुई। मनुष्य खोपड़ी ने धर्म की अलौकिक ताकत में जहां ईश्वर की कल्पना की, उसकी पूजा के लिए ओझा-पुरोहित बनाए वहीं कबीले की सुरक्षा-व्यवस्था के लिए वंशानुगत मुखिया की परपंरा मजबूत हुई। खेती शुरू होने के बाद याकि चार हजार साल पहले जब सभ्यताएं बनने लगीं तो होमो सेपियन के पुरोहित ने मुखिया को ईश्वर की खास कृपा वाला राजा कब घोषित किया, यह अबूझ पहेली है। इतना तय है कि सभ्यता निर्माण से पहले ही ईश्वर, पुरोहित और कबीला सरदार की जोड़ी लोगों में अपना अस्तित्व, दबदबा पाए हुए थी। दोनों एक-दूसरे को प्रमोट करते हुए थे।

पुरोहित-राजा स्थायी
उस नाते होमो सेपियन के इवोल्यूशन का सत्व तत्व है कि उसका कथित सभ्य होना, सभ्यता बनाना, समाज-धर्म-राजनीति का निर्माण कबीलाई परंपरा का विस्तार है। घुमंतू कबीलों में पहले ही समाज, धर्म, राजनीति का खांचा था। तीनों के बनने के पीछे भय, भूख, असुरक्षा की आदिम चिंता लगातार बनी रही। जाहिर है समाज-धर्म-राजनीति तीनों के आइडिया व विकास का कुल जमा इतिहास और अर्थ है अलौकिक ताकत, शक्ति और पॉवर का पॉवरहाउस।
ईश्वर के लोग, ईश्वर के पुरोहित और ईश्वर के अवतारी राजा से बनी होमो सेपियन सभ्यता का यह विस्मयकारी पहलू है जो मनुष्य खोपड़ी की कल्पनाओं में क्या-क्या हुआ, कैसे-कैसे प्रपंच बने और उससे 108 अरब लोगों को कैसी जिंदगी नसीब हुई?

मजेदार बात है कि पूरी पृथ्वी पर सभी मानवों ने समाज, धर्म, राजनीति के त्रिभुज को यूनिर्वसली बनाया और अपनाया। और फिर उनसे मनुष्य बुद्धि मानों दैवीय आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का हिस्सा!
त्रिभुज का निर्माण कब हुआ? सिर्फ चार-पांच हजार साल पहले।
त्रिभुज को आवश्यकता का आविष्कार मानें या यह मनुष्य के भय और अहंकार का भस्मासुरी परिणाम है? अपनी राय में भय-अहंकार का नादान परिणाम!

अहंकार है कमानदार!
तथ्य है भय के आम स्वभाव में ही किलिंग इंस्टिक्ट, शक्तिशाली, स्वामित्ववादी व्यक्तियों के अहंकार से लीडरशीप बनी। अहंकारी मनुष्य समाज के कमानदार हुए। पुरोहितों-राजाओं (दोनों भय में सुरक्षा प्रदाता, पत्थर-लाठी-पॉवरधारक, पालनकर्ता) और उनके नीचे की पॉवर हायरार्की ‘मैं’ यह हिंसा और अहंकार स्वाभाविक है कि ‘मैं’ सब कुछ। रक्षक, मालिक, पालक और सवर्ज्ञ! इसलिए दर्शन और धर्म, महाभारत-रामायण से लेकर ईसाई, इस्लाम, बौद्ध धर्मों की सभी कहानियों में यह विचार मंथन, यह ज्ञानादेश लगातार है कि मनुष्य को कैसे अहम, घमंड से बाहर निकालें। लोगों में यह सोच बने कि वह कुछ नहीं है। वह इहलोक की चिंता छोड़े और संसार की, ईश्वर की, परलोक की सेवा में जिंदगी को सेवा करते हुए गुजारे। पर ज्ञात इतिहास क्या बताता हुआ है? अहंकार की हिंसा में नेता और समाज की लड़ाइयां और मनुष्य को बांधता हुआ समाज-धर्म-राजनीति का त्रिभुज। मतलब धर्मशाही, राजशाही, सामंतशाही, जंगखोरी, लोकतंत्रशाही, शोषणशाही, स्वामित्वशाही, राष्ट्रशाही, हिंसाशाही, आंतकशाही आदि का वह अनुभव जिसका सेंट्रल प्वाइंट किसी न किसी तरह का अहंकार है।

अहम में ही समाज-धर्म-राजनीति की क्रांतियां हुईं। उससे संतुलन बिगड़े। त्रिभुज के तीनों कोण हमेशा मुखिया, राजा, व्यवस्था प्रमुखों के अहंकार से असंतुलित रहे हैं। कभी धर्म के किसी ईश्वर, पोप, पैगंबर से त्रिभुज की भुजाओं का समबाहुत्व खत्म हुआ तो कभी राजनीति के किसी राजा, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, तानाशाह की सनक से मनुष्यों की जेल हुई। कभी समाज के विचारकों, क्रांतिकारियों, जुनूनियों-जिहादियों से पूरा त्रिभुज ही अमानुषिक प्रयोगशाला बना।
उस नाते यह निष्कर्ष प्रमाणित है कि पृथ्वी की 108 अरब मानव संतानों की यंत्रणाओं का नाम है समाज-धर्म और राजनीति का साझा त्रिभुज!

यह निष्कर्ष एक्स्ट्रिम और गलत समझ आ सकता है। कई बुनियादी सवाल उठ खड़े होंगे। लेकिन यदि मौजूदा आठ अरब लोगों की जिंदगी की सच्चाइयों, ज्ञात मानव इतिहास के अनुभवों पर समग्रता से विचार हो तो यह धारणा सिरे से बेतुकी लगेगी कि त्रिभुज से मनुष्यों को अमृत प्राप्त हुआ! 108 अरब लोगों को वह सभ्य जिंदगी मिली, जिसमें भूख, भय, असुरक्षा नहीं, बल्कि खुशी, समृद्धि, सुख-संतोष था। गौर करें मौजूदा आठ अरब लोगों की जिंदगी पर। मानव सभ्यता की आबादी में यदि पहले 98 प्रतिशत लोग नरक भोगते हुए थे तो आधुनिक वक्त में 90-95 प्रतिशत लोग अमानवीय जिंदगी जी रहे हैं। भूख, भय, अंधविश्वासों, लड़ाई-झगड़ों, हिंसा, शोषक-शोषित और तानाशाही की घोषित-अघोषित उन व्यवस्थाओं में हैं, जिसमें जीवन खुली जेल में है।
आठ अरब लोगों का सत्य

195 देशों के अलग-अलग मनुष्य जीवन पर गौर करें? आठ अरब लोगों में से कितने लोग धर्म के अंधविश्वासों, अहंकार, द्वेष और जुनून से ड्राईव हैं? कितने देशों में प्रजा स्वामित्वादी- सर्वसत्तावादी व्यवस्थाओं के जेल में कैदी हैं? फिर भले जेल अलग-अलग धर्मों और नस्ल के हवाले तानाशाहों के कारण हो या सभ्यता के घमंड के कारण। इसके प्रमुख उदाहरण चीन और रूस हैं। कई देशों में समाज ने अभी भी अपने नेतृत्व, राष्ट्रपति को जहां अवतार समझा हुआ है तो हिस्र प्रवृत्तियों को धर्म, इतिहास, समाज की इच्छापूर्ति के लिए राजनीतिक जरूरत। समाज, धर्म और राजनीति तीनों का फैलाया और बनाया यह अज्ञान सर्वग्राह्य है कि बर्बरता जायज है। बुलडोजर चलाना सभ्यता है।

समाज, धर्म और राजनीति के त्रिभुज में मानवता का यह उद्वेलन स्वाभाविक है कि रूस के लोगों और राष्ट्रपति पुतिन का दिमाग अहम और बर्बरता में ऐसा कैसे पका हुआ है जो वे यूक्रेन का ऐसा ध्वंस कर रहे हैं? रूसी समाज  इतना ठूंठ-पशुगत पालूतपना कैसे लिए हुए है जो लोगों के दिल-दिमाग में तनिक भी गिला-अपराधबोध व गुस्सा नहीं और हर अमानुषिता नस्लीय अहंकार में जायज। न शर्म, न अपराधबोध और न कोई दोषी।
सोचें, इक्कीसवीं सदी के मौजूदा अनुभवों पर! तभी यूक्रेनी कवि-उपन्यासकार ओकसाना ज़ाबूझको का यह वाक्य पूरे मानव समाज के लिए विचारणीय है कि ‘दुनिया में दोषी लोग कोई नहीं है?’

मनुष्य अपने को दोषी कैसे समझे? उसकी बुद्धि का तो त्रिभुज से हरण है। हर मनुष्य त्रिभुज की ओपन जेल का बेसुध प्राणी है। हर बुराई याकि ईविल उसे इसलिए खटकती नहीं है क्योंकि उनका इतिहास व वंशानुगत अनुभवों से साधारणीकरण हुआ पड़ा है। कभी तलवार थी तो अब मिसाइल, बुलडोजर व लाठी है। इसलिए वह जायज है और उपयोगी है। पशुता, ईविल और औजार स्थायी है। पर हां, रूप बदलते हैं। कोई बुराई समाज का सहारा है तो किसी से धर्म को बल है और किसी से राजनीति का जलवा बनता है।

सभी की जड़ मनुष्य प्रकृति के ‘मैं’ का अहंकार है। धर्माचार्यों, पोपों, राजाओं (महान अलेक्जेंडर से ले कर चंगेज खां से हिटलर, पुतिन तक) और विचारकों-कहानीकारों के मूर्ख बनाने का तरह-तरह का अहंकार। इनके चकरी पाट ने त्रिभुज को मनुष्यों का वह भंवर बनाया है, जिसमें संभव नहीं यह बूझना कि सभ्यता बना लेने का घमंड खोखला है तो होमो सेपियन (विजडम) याकि मनुष्यों के ‘ज्ञानी’ होने का दावा अहंकारी!

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