Friday, June 14, 2024

तारे आसमान से न टूटे

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डॉ.शैलेन्द्र जैन. अनीस सुल्ताना खान
आसमान में चांद-चांदनी की कई कहानियाँ हमने पढ़ी-सुनी है। तारों का जिक्र कम ही होता है पर क्या तारों के बिना चांद और आसमान का वजूद संभव है। हम कल्पना भी नहीं कर सकते बिना तारों के आसमान की। जब भी आसमान आकाश को याद भी करंे तो चांद-सितारे सब दिखाई देते हैं पर बात मूल रूप से चांद की ही होती है। जबकि तारों के बिना आकाश सूना  है हर तारे की अपनी खुद की रौशनी जो होती है उन्ही तारों की रौशनी में चांद और खूबसूरत दिखाई देता है जबकि उसकी अपना कोई प्रकाश नहीं होता। है न मजेदार और अन्याय जैसा भेदभाव बेचारे तारों के साथ। अफसोस जिन तारों के बिना आकाश सूना, जमी सूनी, चांद सूना, सृष्टि सूनी उन्हीं का नजरअंदाज किया जाना, क्या गुजरती होगी उन तारों पर बेचारे टूट जाते होंगे। पर आसमान में चंद-तारों के टूटने को आसमान के वजूद पर कोई फर्क नहीं पड़ता। चांद-तारों पर इतनी रौशनी डालने का मेरा मतलब कहानियों को दोहराना नहीं है।

मैं टूटते हुए तारों की तुलना   उन नौजवानों से करना चाहता हूँ जो बहुत तेजी से उडक़र मंजिल तक पहुंचना चाहते हैं और रास्ते में आने वाले अवरोध से टकराकर अधूरा जीवन छोडक़र दुनिया छोड़ जाते हंै अपनी इहलीला खुद समाप्त कर लेते हैं। जी हाँ, आपने ठीक समझा आत्महत्या। मैं आत्महत्या की ही बात कर रहां हूँ। आज दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है। आधुनिक तकनीकें इंटरनेट और न जाने क्या-क्या। अब तो दुनिया भी सिमट गई है। पर मॉडर्न, आधुनिक परिवार में पढ़-लिख कर सफलता की ऊंचाईयों को छूने की प्रतियोगिता में हार जाते हैं। आज आए दिन समाचार पत्रों से सोशल मीडिया से यही समाचार मिलते हैं जो हमें दुखी कर देते हैं। झकझोर देते हैं। अपने जीवन से हारने वालों को हम हर क्षेत्र के लोगों में देख रहे हैं। फिल्मी सितारे, स्टूडेंट ,नौकरीपेशा, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर कोई अछूता नहीं है। और ये भी जानता है कि वो नौजवान चाहे लडक़े हो या लड़कियांॅ उनमें प्रतिभा की कमी नहीं थी, होनहार थे पर रातों रात मंजिल पा लेने की होड़ में ही मानसिक तनाव, दुख में घिर जाते हैं।

अपने मन की बातों को अपने परिवार दोस्तों सहकर्मियों से भी नहीं बताते। अकेले संघर्ष करते-करते टूटने लगते हंै, हारने लगते हंै, अपने आप को दूसरों से कम  आंकते हैं जिससे उनका सेल्फ कॉंन्फिडेंस आत्म शक्ति कम होने लगती है। यही प्रतिभावान अब अपने आप को अंधेरों की और ले जाते हैं। अपने आप को सीमित कर लेते हंै, अनसोशल हो जाते हैं, उदास रहने लगते हैं और धीरे-धीरे अपने लक्ष्य से भी दूर हो पाते हैं यही स्थिति होती हैं जब अवसाद (डिप्रेशन) से ग्रस्त हो जाते हैं। अपने अंदर की हीन भावना ही उन्हें अब आत्म हत्या के लिए प्रेरित करने लगती है। अब वो अपने लक्ष्य पर नहीं बल्कि जीवन समाप्त करने के रास्तों पर अग्रसर होने लगते हैं। ये सोचे बिना कि दुनिया में अपने परिवार में वो अकेले नहीं हैं। उनसे कितने लोग जुड़े हंै। माता-पिता, भाई-बहन पत्नी, बच्चे। लेकिन इस ओर ध्यान ही नहीं जाता कि मेरे मरने के बाद इन सब पर क्या बीतेगी? कभी-कभी लगता है, कि इतनी जिंदगियों को बीच मझधार में छोडक़र खुद दुखों से छुटकारा पाने की चाहत रखने वाला कमजोर नहीं अपितु स्वार्थी होता है।

जो अपने सिवा अन्य की परवाह नहीं करता? अवसाद को रोकने और देह त्याग से बचने को ध्यान में रखकर एक छोटी सी कहानी प्रस्तुत है-अपना कम्प्यूटर बंद करके शाम को पांच बजे मैं जैसे ही अपनी शॉप बंद करके बाहर निकला एक लालबत्ती वाली सफेद कार मेरे सामने आकर रुकी। मैं असमंजस में था कि ये गाड़ी यहां क्यों आई है। कई सवाल मेरे मन में उठने लगे। मैं इस शहर में कम्प्यूटर कोचिंग का स्कूल चलाता था। आई.आई.टी. जैसे संस्थान में प्रवेश लेने वाले स्टूडेंट्स मेरी कोचिंग क्लास में आते थे। कोचिंग सेंटर तीन शिफ्ट में चलता था। धीरे-धीरे मेरे कोचिंग का अच्छा खासा नाम शहर में प्रचलित हो गया था। जिससे मेरी गृहस्थी  अच्छी चल रही थी। कार उतर कर आए आदमी ने मुझसे कहा आपको साहब ने बुलाया है। कौन साहब? मैने पूछा। उसने कहा कलेक्टर साहब ने। क्या काम है? कुछ व्यक्तिगत काम है, अभी चलियेगा। मैने समाचार पत्र में पढ़ा था कुछ तबादले उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के होने वाले हंै। पता नहीं नये कलेक्टर कौन आए हैं जिन्होंने मुझे बुलावा भेजा है। मैने अपनी होंडा सिटी निकालने के लिए चाबी निकाली। लेकिन उसने कहा इसी गाड़ी से चलना है।

मैं अनमने मन से उसकी कार में बैठ गया और सोचने लगा, पता नहीं क्या काम है मुझसे। पर मैंने ड्रायवर से ज्यादा बात नहीं की। कलेक्ट्रेट पहुंच कर मैं जैसे कलेक्टर साहब के कमरे में गया, मैने देखा, सुभाष मेरे बचपन का साथी सीट पर बैठा हुआ था। अभिवादन  कर मैं बैठ गया। सुभाष के चेहरे से तेज झलक रहा था लेकिन एक उदासी भी उसकी आंखों में मैने महसूस किया। उसने कहा सोहन ने आत्महत्या कर ली। क्या तुम्हें मालूम नहीं। बी.ई.ग्रैजुएशन करने के बाद हम तीनों दोस्त अपने-अपने रास्ते हो गये थे। सभी के अपने-अपने सपने थे। जीवन में बहुत कुछ अच्छा ऊँचा करने की चाहतें थी। सपने मैंने भी बुने थे। हम  तीनों में सुभाष कुछ ज्यादा ही महत्वाकांक्षी था। तो सोहन भी कुछ कम नहीं था। मध्यमवर्गीय परिवार से था, पर ऊर्जा से भरा हुआ। लेकिन मुझे लगता था कि मैं इन दोनों से थोड़ा हटकर हूँ। रसोई से खाली बर्तनों की आवाज आ जाए तो खाना मांगना मूर्खता है। ऐसी मेरी सोच थी। क्या चमकने वाले ही सफल जिंदगी जीते हैं। कई उदाहरणों से मैं प्रेरित होता था जैसे अब्दुल कलाम, अब्राहम लिंकन, विपरीत परिस्थितियों और अभाव में भी राष्ट्रपति जैसे पदों पर पहुंचे थे। पर यदि हम उच्च पदों पर नहीं पहुंचे तो क्या अपना मानसिक संतुलन खो दें। तुमने आज का अखबार पड़ा सुभाष की आवाज से मंै अतीत से वर्तमान में वापस लौटा। मैने कहा क्यों-क्या हुआ? आत्महत्या कर ली। वह यूपीएससी क्लीयर नहीं कर सका। उसका बड़ा बनने का इरादा था।

रमेश एक सामान्य वर्ग का छात्र जो हम लोगों के साथ ही पढ़ता था। 98 प्रतिशत आने पर भी घर वालों का उस पर दबाव बना रहता 99 प्रतिशत 100 प्रतिशत लाने का। इस मामले में मैं लक्की था मेरे 78 प्रतिशत लाने पर भी अभिभावक मुझे प्रोत्साहित करते थे। कोई बात नहीं, अगले साल मेहनत करना जीवन एक पगडंडी है किसी पर भी सवार होकर जाओ मंजिल देर-सबेर पार हो जाती है। यही सीख मुझे दी जाती थी। पर रमेश हमेशा दौडऩे की बात करता उसकी समझ में ये बात कभी नहीं आती कि कुछ हासिल करने के लिए जरूरी नहीं कि दौड़ा जाए। कुछ चीजें ठहरने या धीरे चलने से भी मिल जाती हैं। मैंने ग्रेजुएशन के बाद कुछ समय स्कूल में नौकरी की, फिर अपना कोचिंग क्लास शुरु किया और आज धीरे-धीरे कछुए और खरगोश की कहानी की तरह नाम व ख्याति, सम्मान पा गया। मन में शांति और संतुष्टि रखा केवल सपनों की ही उड़ान नहीं भरी। न जाने क्यों लोग अपने जान के पीछे पड़े रहते हैं। अपने स्टूडेंट्स को भी कम्प्यूटर के प्रशिक्षण के साथ-साथ नई युवा पीढ़ी को भी मैं यही सिखाता हूँ, सपने देखना, ऊंचे से लक्ष्य रखना गलत नहीं है पर अब जमाना बदल गया है।

नौजवानों के लिये संदेश
अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवार के परिवार में माता-पिता जो हासिल नहीं कर पाते वह अपने बच्चे के भविष्य के आईने में उन सपनों को देखते हैं। साथ ही बच्चा समाज, मीडिया आदि की प्रतिक्रियाओं, समाचारों आदि में भविष्य में कुछ बनने की जिद के चलते उन विचारों को रुई के गट्ठर की तरह सिर पर धारण कर लेता है। जो कहावतों के पानी से भारी हो जाती है जिन्हें उसे सहन करना मुश्किल हो जाता है।
लेखक-* प्रतिमेष हॉस्पिटल नेहरु नगर पश्चिम भिलाई के प्रोप्रायटर, ** साइकोलॉजिस्ट और फैमिली पुलिस काउंसलर हैं

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