आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि ने हरिद्वार अखाड़ा विवादों पर की निष्पक्ष सरकारी जांच की मांग

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देहरादून। वर्ष 2027 में प्रस्तावित हरिद्वार अर्धकुंभ से पहले संत समाज के भीतर विवाद गहराता जा रहा है। पहले अर्धकुंभ की मान्यता को लेकर मतभेद सामने आए, फिर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद दो गुटों में बंट गई और अब मामला 'असली और नकली देवी-देवताओं' तक पहुंच गया है। इन घटनाक्रमों ने न केवल अखाड़ों की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस महापर्व की तैयारियों को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। सबसे बड़ा सवाल यह बन गया है कि आखिर 2027 के अर्धकुंभ का नेतृत्व किस अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष की अगुवाई में होगा। दोनों गुट खुद को वैध और असली परिषद बताते हुए बहुमत का दावा कर रहे हैं। एक ओर निरंजनी अखाड़े से जुड़े महंत रविंद्र पुरी और महामंत्री हरिगिरि महाराज का गुट स्वयं को वास्तविक परिषद बता रहा है, जबकि दूसरा गुट महानिर्वाणी अखाड़े समेत अन्य अखाड़ों के समर्थन के साथ अपने अधिकार का दावा कर रहा है। दोनों पक्ष अलग-अलग बैठकों का हवाला देकर अपने साथ अधिक अखाड़ों के होने का दावा कर रहे हैं। ऐसे में मेला प्रशासन और राज्य सरकार के सामने भी यह चुनौती खड़ी हो गई है कि आधिकारिक स्तर पर किस परिषद के साथ समन्वय स्थापित किया जाए। इसी बीच नया उदासीन अखाड़े से जुड़ा एक नया विवाद पूरे संत समाज में चर्चा का विषय बन गया है। पंजाब से आए कुछ संतों ने दावा किया है कि हरिद्वार में वर्षों से जिन देवी-देवताओं की पूजा और शाही स्नान कराया जाता रहा है, वे वास्तविक नहीं हैं। उनका कहना है कि असली देवता पंजाब में सुरक्षित हैं और आगामी अर्धकुंभ में केवल उन्हीं का शाही स्नान कराया जाना चाहिए। इस बयान के बाद संत समाज में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।

दूसरी ओर, महानिर्वाणी गुट से जुड़े संतों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि ऐसे आरोप लगाने वाले कई लोगों को पहले ही अखाड़ा विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित किया जा चुका है। उनका आरोप है कि कुछ लोग धार्मिक भावनाओं को भड़काकर अखाड़ा परिषद की वैधता पर सवाल उठाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस तरह के आरोप जारी रहे तो कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी। इस पूरे विवाद के बीच आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि महाराज ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि मामला अत्यंत गंभीर और संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि नया उदासीन अखाड़े के कई संत उनके पास अपनी शिकायत लेकर आए हैं। एक पक्ष का दावा है कि असली देवता उनके पास हैं, जबकि दूसरा पक्ष इसे पूरी तरह गलत बता रहा है। ऐसे में उत्तराखंड सरकार को निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि तथ्यों के आधार पर सच्चाई सामने आ सके। स्वामी कैलाशानंद गिरि ने स्पष्ट कहा कि उनकी सबसे बड़ी चिंता सनातन धर्म की गरिमा और संत समाज की प्रतिष्ठा है। उन्होंने कहा कि देवता कभी नकली नहीं हो सकते और समाज में ऐसा संदेश जाना भी उचित नहीं है। उनके अनुसार धार्मिक परंपराओं से जुड़े मामलों का समाधान सड़क पर नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था और संवाद के माध्यम से होना चाहिए। इस बीच सरकार ने भी संत समाज से आपसी सहमति से समाधान निकालने की उम्मीद जताई है। हरिद्वार से विधायक एवं राज्य सरकार में मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि यह धार्मिक परंपराओं से जुड़ा विषय है और सरकार को विश्वास है कि आयोजन से पहले अखाड़े स्वयं इस विवाद का समाधान निकाल लेंगे। उन्होंने कहा कि किसी भी पक्ष का अहित नहीं होना चाहिए और अर्धकुंभ की गरिमा हर हाल में बनी रहनी चाहिए। धार्मिक मामलों के जानकारों का भी मानना है कि सार्वजनिक मंचों पर 'असली-नकली परिषद' और 'असली-नकली देवता' जैसे विवाद सनातन परंपरा की छवि को प्रभावित कर सकते हैं। धार्मिक विशेषज्ञ प्रतीक मिश्र पुरी का कहना है कि कुंभ और अर्धकुंभ केवल संतों का आयोजन नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा महापर्व है। इसलिए सभी पक्षों को संवाद और परंपरागत व्यवस्था के माध्यम से समाधान तलाशना चाहिए। अर्धकुंभ 2027 में अभी समय है, लेकिन जिस तरह नेतृत्व, परिषद की वैधता, नया उदासीन अखाड़े के भीतर मतभेद, बैरागी अखाड़ों की नाराजगी और अब देवी-देवताओं को लेकर विवाद सामने आ रहे हैं, उससे तैयारियों पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। अब सभी की निगाहें उत्तराखंड सरकार, मेला प्रशासन और संत समाज पर टिकी हैं कि क्या समय रहते इन विवादों का समाधान निकल पाएगा या अर्धकुंभ से पहले यह टकराव और गहरा होगा।