झारखंड में 36 छात्रों पर एक शिक्षक, शिक्षक संकट के बीच 25 हजार गुरुजी संभालेंगे बीएलओ का जिम्मा

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रांची। झारखंड में 30 जून से शुरू होने जा रहे विशेष मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान को लेकर शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक अमले के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। राज्य के सरकारी स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी है, और अब इस नए अभियान में बड़े पैमाने पर शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति (डिटेचमेंट) किए जाने के फैसले पर शिक्षक संगठनों ने कड़ा ऐतराज जताया है। 'झारखंड माध्यमिक शिक्षक संघ' ने सरकार के इस कदम का पुरजोर विरोध करते हुए कहा है कि इस फैसले से स्कूलों में पठन-पाठन का माहौल पूरी तरह से चरमरा जाएगा और इसका सीधा खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ेगा। संघ के प्रदेश महासचिव गंगा प्रसाद यादव ने सरकार से मांग की है कि शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से सभी गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त रखा जाए। उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि शिक्षकों का मूल दायित्व बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन लगातार चुनाव, जनगणना, और अब मतदाता पुनरीक्षण जैसे कार्यों में ड्यूटी लगाए जाने से विद्यालयों की नियमित पढ़ाई ठप हो जाती है। महासचिव ने कहा, "विशेष रूप से माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों को बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) और चुनावी कार्य में झोंक देने से 10वीं और 12वीं के बोर्ड परीक्षार्थियों की तैयारी पर बेहद बुरा असर पड़ेगा। विडंबना देखिए कि जब परीक्षा परिणाम खराब आते हैं, तो शिक्षा विभाग शिक्षकों को कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि शिक्षकों का आधा समय पढ़ाने के बजाय प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कार्यों में ही निकल जाता है।" उन्होंने सरकार से 30 जून से शुरू होने वाले इस अभियान में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति पर तुरंत पुनर्विचार करने का आग्रह किया है।

वहीं, जिला सचिव संजय यादव ने भी शिक्षकों पर बढ़ते अतिरिक्त काम के बोझ पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि राज्य में जनगणना का कार्य अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ है और अब मतदाता पुनरीक्षण अभियान की बड़ी जिम्मेदारी भी शिक्षकों के कंधों पर डाल दी गई है। इससे स्कूलों में सुचारू रूप से कक्षाएं चलाना असंभव हो जाएगा। दूसरी तरफ, चुनावी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों का तर्क है कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण एक बेहद महत्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा है। इस कार्य को समय पर पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर मानव संसाधन की आवश्यकता होती है। राज्य में कुल 24,520 मतदान केंद्र हैं। वर्तमान में करीब 50 हजार बीएलओ में से लगभग 7,500 शिक्षक पहले से ही इस कार्य में तैनात हैं, जबकि इस नए अभियान को सफल बनाने के लिए 25 हजार से अधिक और शिक्षकों की सेवाएं ली जा सकती हैं। हालांकि, अधिकारियों ने दावा किया है कि जिन स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है, वहां वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी ताकि बच्चों का नुकसान न हो। शिक्षक संगठनों का यह तर्क आंकड़ों के लिहाज से भी बेहद मजबूत नजर आता है। राष्ट्रीय छात्र-शिक्षक अनुपात के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में औसतन 36 विद्यार्थियों पर महज एक शिक्षक उपलब्ध है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 24 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक का है। ऐसे में जब राज्य पहले से ही गंभीर शिक्षक संकट से जूझ रहा है, उपलब्ध शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाना पूरी शिक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर रहा है। शेड्यूल के अनुसार, 30 जून से शुरू होने वाले इस एसआईआर अभियान के तहत बीएलओ घर-घर जाकर मतदाताओं का भौतिक सत्यापन करेंगे। इसके बाद 1 अगस्त को प्रारूप मतदाता सूची का प्रकाशन होगा। 4 अगस्त से 1 सितंबर तक आम जनता को दावा एवं आपत्ति दर्ज करने का अवसर मिलेगा। सभी दावों के निष्पादन के बाद 7 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। अब देखना यह होगा कि शिक्षक संगठनों के इस भारी आक्रोश के बीच सरकार अपने फैसले पर अडिग रहती है या शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए कोई बीच का रास्ता निकालती है।