जिलों की लेटलतीफी से नाराज उत्तराखंड के हजारों शिक्षक, सुगम क्षेत्रों में तैनाती की उम्मीदें टूटने की कगार पर

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देहरादून। उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में तबादलों की प्रक्रिया एक बार फिर कछुआ चाल का शिकार हो गई है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक और शासन के सख्त निर्देशों के बावजूद, जिलों से अब तक तबादलों के प्रस्ताव शिक्षा निदेशालय नहीं पहुंचे हैं। हालत यह है कि विभाग न तो अनिवार्य तबादलों के लिए कर्मचारियों से 10 विकल्प ले पाया है और न ही धारा 27 के तहत होने वाले विशिष्ट तबादलों की फाइलें आगे बढ़ सकी हैं।

हाल ही में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में तबादलों को लेकर शासन स्तर पर महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। इसके बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि प्रक्रिया में तेजी आएगी, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। शिक्षा निदेशालय ने 28 मार्च 2026 को ही सभी जिलों को पत्र लिखकर धारा 27 के तहत तबादला एक्ट के आवेदनों का परीक्षण कर प्रस्ताव मांगे थे। विभाग ने स्पष्ट किया था कि अभिलेखों की जांच के बाद ही प्रस्ताव भेजे जाएं, लेकिन हफ्तों बीत जाने के बाद भी जिलों ने निदेशालय को रिपोर्ट नहीं सौंपी है। इस साल भी शिक्षा विभाग में शिक्षकों और कर्मचारियों के अनिवार्य व अनुरोध के आधार पर होने वाले सामान्य तबादलों पर संशय बना हुआ है। विभागीय सुस्ती का आलम यह है कि अधिकतर विभाग अनिवार्य श्रेणी में आने वाले कर्मचारियों से अनिवार्य '10 विकल्प' लेने की प्रक्रिया तक शुरू नहीं कर पाए हैं। नियमानुसार तबादलों से पहले कर्मचारियों से उनकी पसंद के दस स्थानों के विकल्प लिए जाने जरूरी हैं, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। तबादला एक्ट की धारा 27 के तहत उन शिक्षकों या कर्मचारियों के तबादले किए जाते हैं जिनके पास कोई गंभीर या विशिष्ट परिस्थिति होती है। उच्च स्तर से निदेशालय को इसके कई आवेदन प्राप्त हुए थे। निदेशालय ने इन फाइलों को वेरिफिकेशन के लिए जिलों को भेजा था, लेकिन जिलों की लेटलतीफी के कारण अब इन शिक्षकों का भविष्य लटका हुआ है। समय पर तबादला सूची जारी न होने और प्रक्रिया शुरू न होने से प्रदेश भर के हजारों शिक्षकों और कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ रही है। कई शिक्षक अपने गृह जनपद या सुगम क्षेत्रों में जाने की आस लगाए बैठे हैं, लेकिन विभाग की ओर से अब तक विधिवत प्रक्रिया शुरू न किए जाने से उनकी उम्मीदें टूटती नजर आ रही हैं। जानकारों का मानना है कि यदि जल्द ही जिलों से प्रस्ताव नहीं आए, तो इस साल भी तबादला सत्र शून्य होने की कगार पर पहुंच सकता है।