उत्तराखंड निर्वाचन कार्यालय ने सूची से साढ़े चार लाख डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम हटाए

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देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति और लोकतांत्रिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पिछले महज एक साल के भीतर प्रदेश की मतदाता सूची से 4,53,459 मतदाताओं के नाम कम हो गए हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय द्वारा चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और शुद्धिकरण अभियान के बाद मतदाताओं की संख्या 84.29 लाख से घटकर अब 79,76,000 रह गई है। चुनाव आयोग ने इसे एक सामान्य लेकिन जरूरी प्रक्रिया बताया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाना है।

अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. विजय कुमार जोगदंडे के अनुसार, वर्ष 2003 के बाद से प्रदेश में इतना व्यापक 'विशेष गहन पुनरीक्षण' नहीं हुआ था। इस लंबे अंतराल के कारण मतदाता सूची में कई ऐसे नाम शामिल थे जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जो दूसरे राज्यों में विस्थापित हो चुके हैं। इस बार चुनाव आयोग ने एएसडी  (एब्सेंट, शिफ्टेड, डेथ) सूची पर बारीकी से काम किया। साथ ही, आधुनिक 'डुप्लीकेसी सॉफ्टवेयर' का इस्तेमाल कर उन नामों को हटाया गया जो दो अलग-अलग जगहों की सूची में दर्ज थे। लोकसभा चुनाव 2024 के समय राज्य में 84,31,101 मतदाता थे, लेकिन शुद्धिकरण के बाद यह आंकड़ा अब 80 लाख के नीचे पहुंच गया है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती उन 9,76,000 मतदाताओं की है, जिनकी बीएलओ मैपिंग अब तक पूरी नहीं हो पाई है। दरअसल, प्रदेश के कुल 79.76 लाख मतदाताओं में से 70 लाख की मैपिंग तो सफल रही, लेकिन शेष करीब 10 लाख लोगों का 2003 की मतदाता सूची से मिलान नहीं हो पा रहा है। अब एसआईआर के अगले चरण में इन मतदाताओं को 'गणना प्रपत्र' दिए जाएंगे। उन्हें अपने 2003 के मतदान से संबंधित जानकारी देनी होगी। यदि मतदाता सही जानकारी नहीं दे पाता है या निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी जानकारी से संतुष्ट नहीं होता है, तो संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी किया जाएगा। संतोषजनक जवाब न मिलने की स्थिति में उनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया जाएगा। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि नाम हटाने की प्रक्रिया के साथ-साथ नए वोट बनाने का काम भी निरंतर जारी रहेगा। जो युवा 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं या जिनका नाम किन्हीं कारणों से सूची में नहीं है, वे फॉर्म-6 भरकर अपना नाम दर्ज करा सकते हैं। मतदाता अपने क्षेत्र के बीएलओ (BLO) से संपर्क कर सकते हैं या ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भी आवेदन कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस शुद्धिकरण से आने वाले चुनावों में वोटिंग प्रतिशत की सटीक तस्वीर सामने आएगी। फर्जी और दोहरी प्रविष्टियां हटने से चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता और बढ़ेगी। हालांकि, जिन 9 लाख लोगों का रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है, उन्हें अब अपनी नागरिकता और पहचान के प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए सजग होना होगा।