उत्तराखंड में वनाग्नि रोकथाम को रोजगार से जोड़ रही वन विभाग की पहल

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उत्तराखंड में हर वर्ष वनाग्नि से होने वाले भारी नुकसान को रोकने और जंगलों के संरक्षण के उद्देश्य से वन विभाग ने एक सराहनीय और दूरदर्शी पहल की है। पौड़ी जनपद में वन विभाग द्वारा लीसा दोहन से रोजगार सृजन एवं वनाग्नि सुरक्षा जन-जागरूकता कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य जहां एक ओर जंगलों को आग से बचाना है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों, खासकर महिलाओं और युवाओं को आजीविका के स्थायी साधन से जोड़ना भी है। कार्यक्रम में पौड़ी विधायक राजकुमार पोरी ने कहा कि लीसा दोहन केवल वन संपदा संरक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार का एक बड़ा अवसर भी प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि इस पहल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, लोगों की आय बढ़ेगी और पलायन पर भी प्रभावी रोक लगेगी। विधायक ने वनाग्नि की रोकथाम में जनसहभागिता को अत्यंत आवश्यक बताते हुए आम जनता से वन संरक्षण को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मानकर सहयोग करने की अपील की।

गढ़वाल वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) महातिम यादव ने बताया कि वन विभाग द्वारा लीसा विदोहन (राल निकासी) की प्रक्रिया को अब पूरी तरह वैज्ञानिक, संगठित और सुरक्षित पद्धति से संचालित किया जा रहा है। परंपरागत अवैज्ञानिक तरीकों के स्थान पर प्रशिक्षित श्रमिकों द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप चीड़ के पेड़ों से बिना नुकसान पहुंचाए लीसा निकाला जा रहा है। इससे न केवल वन संपदा का संरक्षण सुनिश्चित हो रहा है, बल्कि संसाधनों का बेहतर उपयोग भी संभव हो पा रहा है। DFO ने बताया कि लीसा से प्राप्त राजस्व का एक बड़ा हिस्सा ग्राम पंचायतों को दिया जाता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पेयजल, सामुदायिक भवन, स्वच्छता और अन्य जनहित के विकास कार्यों को गति मिलती है। इसके साथ ही नियंत्रित एवं वैज्ञानिक लीसा विदोहन से चीड़ के पेड़ों में मौजूद ज्वलनशील पदार्थों का दबाव कम होता है, जिससे गर्मियों के दौरान वनाग्नि की घटनाओं में कमी आने की संभावना बढ़ जाती है। कार्यक्रम की खास बात यह रही कि प्रसिद्ध लोकगायक गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी की सुमधुर और प्रेरणादायक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके लोकगीतों और संदेशों के माध्यम से वन संरक्षण और वनाग्नि सुरक्षा का महत्व प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचाया गया। इसके अलावा नुक्कड़ नाटकों और जनसंवाद के जरिए ग्रामीणों को जंगलों के महत्व, आग से होने वाले नुकसान और सामूहिक भागीदारी की आवश्यकता के प्रति जागरूक किया गया।