गदरपुर विधायक को मनाने की कोशिशें नाकाम? महेंद्र भट्ट के दौरे के बाद भी समीक्षा बैठक से दूर रहे पांडे

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देहरादून। उत्तराखंड में साल 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार और संगठन के बीच तालमेल बिठाकर चुनावी वादों को पूरा करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सत्ताधारी दल के भीतर सब कुछ ठीक नहीं नजर आ रहा है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में आयोजित नौ विधानसभा क्षेत्रों की समीक्षा बैठक में गदरपुर विधायक और पूर्व मंत्री अरविंद पांडे की अनुपस्थिति ने राज्य के सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को नौ विधानसभा क्षेत्रों में अपनी पूर्व घोषणाओं की प्रगति जांची। बैठक के दौरान सीएम ने स्पष्ट किया कि विधायकों द्वारा उठाई गई क्षेत्रीय समस्याएं शासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को दो टूक निर्देश दिए कि छोटे कामों को तत्काल पूरा किया जाए और बड़ी परियोजनाओं को समयसीमा के भीतर चरणबद्ध तरीके से धरातल पर उतारा जाए। मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को उन योजनाओं की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करने को कहा है जिनमें एक से अधिक विभाग शामिल हैं, ताकि आपसी तालमेल की कमी से विकास कार्य न रुकें। बैठक में गदरपुर विधायक अरविंद पांडे का शामिल न होना भाजपा के भीतर अंदरूनी कलह के संकेत दे रहा है। सूत्रों के अनुसार, अरविंद पांडे पिछले कुछ समय से सरकार की कार्यप्रणाली या क्षेत्रीय उपेक्षा को लेकर नाराज चल रहे हैं। उनकी नाराजगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट खुद उन्हें मनाने के लिए गदरपुर पहुंचे थे, लेकिन समीक्षा बैठक से उनकी दूरी बताती है कि 'बर्फ' अभी पूरी तरह पिघली नहीं है। चुनावी वर्ष के मुहाने पर खड़े राज्य में एक कद्दावर नेता की यह बेरुखी संगठन के लिए चिंता का सबब बन सकती है। मुख्यमंत्री ने बैठक में अधिकारियों को विधायकों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखने की हिदायत दी। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधि और प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल से ही विकास कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है। बैठक में उपस्थित अन्य विधायकों ने अपने क्षेत्रों में सड़क निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण, मिनी खेल मैदान, जंगली जानवरों से सुरक्षा और आगामी मानसून के मद्देनजर बाढ़ सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से रखा। अरविंद पांडे की अनुपस्थिति ऐसे समय में हुई है जब भाजपा पूरी तरह 'चुनावी मोड' में आने की तैयारी कर रही है। विपक्ष इस घटनाक्रम को सरकार के भीतर असंतोष के रूप में देख रहा है। अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री और संगठन मिलकर इस 'आंतरिक गतिरोध' को समय रहते कैसे दूर करते हैं, क्योंकि गदरपुर जैसी महत्वपूर्ण सीट और अरविंद पांडे जैसा अनुभव पार्टी के लिए आगामी चुनावों में काफी मायने रखता है।